पौंग व भाखड़ा बाँध में पानी आवक कम होना बेहद चिंताजनक: सांसद निहाल चन्द

पौंग व भाखड़ा बाँध में पानी आवक कम होना बेहद चिंताजनक: सांसद निहाल चन्द

12 जुलाई 2021

नई दिल्ली: लोकसभा की जल संसाधन संबंधी स्थायी समिति द्वारा ग्लेशियर मैनेजमेंट को लेकर हिमाचल प्रदेश जलदाय विभाग और जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार के साथ हिमाचल प्रदेश में हुई बैठक में चर्चा करते हुए पूर्व केन्द्रीय मंत्री व श्रीगंगानगर से लोकसभा सांसद निहाल चन्द जी ने आज पौंग बाँध और भाखड़ा बाँध में आने वाले पानी की आवक कम होने पर चिंता जाहिर की है और साथ ही सम्बंधित अधिकारीयों से इस सम्बन्ध में जल्द से जल्द स्थिति में सुधार करने को कहा है । साथ ही उन्होंने हिमाचल क्षेत्र में स्थित हिमालय के ग्लेशियरों के तेजी से पिंघलने पर भी चिंता जाहिर की है, जोकि पहाड़ी क्षेत्रों के साथ-साथ मैदानी ईलाकों के लिए भी खतरनाक है ।
ब्यास नदी पर एशिया के सबसे बड़े पौंग बांध में 20 जून से जलभराव सीजन शुरू हो चुका है, लेकिन बारिश न होने से पानी की कमी है । अगर बारिश न हुई तो स्थिति और गंभीर हो सकती है । शनिवार को बांध का जलस्तर जहां 1277.61 फीट रहा, वहीं मात्र 7282 क्यूसिक पानी की आवक हुई और 8014 क्यूसिक पानी शाह नहर बैराज में छोड़ा गया । यदि पिछले साल इसी दिन की बात करें तो 1334.07 फीट जलस्तर रिकार्ड किया गया था, जोकि 57 फीट अधिक था । सबसे चिताजनक बात यह कि 20 दिन पहले महाराणा प्रताप सागर झील में 1289.24 फीट जलस्तर था जो अब 1277.61 फीट रह गया है, यानी कि 12 फीट पानी घट गया । बांध से हरियाणा, पंजाब, हिमाचल व राजस्थान को पानी सिचाई के लिए आबंटित किया जाता है । चाहे बांध ब्यास नदी पर बना है पर यह पूरी तरह बारिश पर निर्भर है, क्योंकि ब्यास का सारा पानी मंडी में ब्यास-सतलुज लिक सुरंग से सतलुज में डाल दिया गया है और वहां से सीधा भाखड़ा बांध में चला जाता है । नतीजतन, पौंग बांध में ग्लेशियरों का पानी नहीं आता बल्कि मात्र बारिश का पानी ही एकत्रित होता है इसलिए पौंग बांध को रेन फेड और भाखड़ा को स्नो फेड कहते हैं ।

हिमाचल प्रदेश के हिमालयी क्षेत्रों में ग्लोबल वार्मिंग की वजह से लगातार नई झीलों का बनना जारी है । बढ़ते तापमान की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं और ऊंचाई वाले इलाकों में अब तक करीब 800 छोटी-बड़ी झीलें बन चुकी हैं । 550 से ज्यादा झीलें हिमाचल प्रदेश के लिहाज से संवेदनशील हैं । इन झीलों पर विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद का सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज लगातार अध्ययन कर रहा है और अपनी नजर रखे हुए है । पिछले कुछ सालों में ही सतलुज, चिनाब, रावी और ब्यास बेसिन पर 100 से अधिक नई प्राकृतिक झीलें बन गई हैं । सतलुज बेसिन पर कुल 500, चिनाब में 120, ब्यास में 100 और रावी में 50 झीलें बनी हैं । वर्ष 2014 में सतलुज बेसिन पर केवल 391 झीलें थीं, जो अब 500 के करीब है । सतलुज नदी के वार्षिक प्रवाह का लगभग आधा हिस्सा ग्लेशियरों के पिंघलने से आता है और हिमाचल प्रदेश के भाखड़ा बांध में जा रहे जल का 80 प्रतिशत हिस्सा भी इसी नदी से आता है । कुल मिलाकर ये बाँध ग्लेशियर पिंघलने से बनी झीलों और और वर्षा के पानी पर ही निर्भर है और ग्लेशियरों के निरंतर पिंघलने से धीरे-धीरे धारा प्रवाह में कमी आ रही है जोकि भाखड़ा जलाशय में जाने वाले पानी को प्रभावित कर रही है, साथ ही मानसून की देरी से स्थिति और गंभीर हो गई है ।
सांसद महोदय ने इस विषय की गंभीरता को देखते हुए हिमाचल प्रदेश के जलदाय विभाग के अधिकारीयों से जल्द इस विषय पर संज्ञान लेते हुए त्वरित और ठोस कार्यवाही करने को कहा है, ताकि दिन बी दिन बढ़ने वाले जल संकट का स्थायी समाधान निकाला जा सके । समिति के अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल व अन्य सदस्यों ने भी इस सम्बन्ध में हिमाचल प्रदेश सरकार को एक विस्तृत रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजने हेतु निर्देशित किया है, साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि मानसूनी वर्षा होने पर स्थिति में व्यापक सुधार होगा ।

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